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दूसरा आज्ञा

आज्ञा 2

तू अपने लिये कोई मूर्ति खोदकर न बनाना,……….”(निर्गमन 20:4)
“तू उनको दण्डवत् न करना, और न उनकी उपासना करना; क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर यहोवा जलन रखनेवाला परमेश्वर हूँ, और जो मुझसे बैर रखते हैं, उनके बेटों, पोतों, और परपोतों को भी पितरों का दण्ड दिया करता हूँ,”(निर्गमन 20:5)

पहली आज्ञा हमें बताती है कि परमेश्वर के सामने हमारे पास कोई अन्य देवता नहीं होगा। दूसरी आज्ञा हमें बताती है कि हमें परमेश्वर की उपस्थापना करने के लिए कोई मूर्ति या देवता नहीं बनाना चाहिए। जिस चीज़ को हम देख या छू सकते हैं उस चीज़ को परमेश्वर मानकर पूजा करना अनुचित है। बाइबिल कहती है,

“…….तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।“ (मत्ती 4:10)

परमेश्वर एक आत्मा है. हम उसे देख या छू नहीं सकते. जब परमेश्वर ने सबसे पहले पहले दिनों अपने चुने हुए लोगों से बात की, तो बाइबल का कहना है कि उन्होंने “परमेश्वर के रूप में कोई मूर्ति को नहीं देखी।

सभी मूर्ति परमेश्वर के लिए घृणित हैं। हमारे सृष्टिकर्ता परमेश्वर पूजा और महिमा पाने के योग हे। परमेश्वर के इस छवि को मूर्तियां अपहरण कर लेते हैं जिसका परमेश्वर हकदार हैं। यदि परमेश्वर ने हमें बनाया है, तो वह हमारे जीवन में सबसे पहले होना चाहिए। बाइबल में कभी भी स्वर्ग के परमेश्वर और उसके पुत्र यीशु मसीह को छोड़कर किसी को भी दंडवत(प्रणाम) या उसकी पूजा करने की अनुमति देने का उल्लेख नहीं है।हालाँकि, हमें ध्यान देना चाहिए कि मानव निर्मित मूर्तियों के अलावा अन्य प्रकार की मूर्तियाँ भी हैं। हम जिससे परमेश्वर से भी बढ़कर मानते हैं। अगर हमें कोई चीज़ अधिक पसंद आती है तो हम उसे अपना आदर्श मान लेते हैं। ये, शिक्षा, धन, सौंदर्य, लोकप्रियता, और किसी भी व्यक्ति को आदर्श मानकर पूजा करते हैं।

जो कुछ भी आपके और परमेश्वर के बीच आता है वह आपके लिए एक आदर्श है। बहुत से लोग ‘पैसे’ को परमेश्वर बना लेते हैं, जिसके लिए वे काम करते हैं और जीते हैं। दूसरे लोग हर्ष(आनंद) और उल्लास(रोमांच) का देवता(मूर्ति)बनाते हैं। एसा कोई भी चीज़ जो आपके जीवन में हे वो परमेश्वर के द्वार को बंद कर देती है, और आपके और परमेश्वर के बीच आती है, आपके जीवन की मूर्ति, आप के हृदय को विभाजित कर देती है। और परमेश्वर विभाजित हृदय को स्वीकार नहीं करेंगे। यीशु ने कहा,

“कोई मनुष्य दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता, क्योंकि वह एक से बैर और दूसरे से प्रेम रखेगा, या एक से निष्ठावान रहेगा और दूसरे का तिरस्कार करेगा…..” (मत्ती 6:24)

परमेश्वर के प्रति हमारा दृष्टिकोण केवल उससे प्रेम करना, उसकी आराधना करना है। जो परमेश्वर “सारी दुनियां का सृष्टिकर्ता” है। और वह कहता है,

“मैं यहोवा हूं, मेरा नाम यही है; अपनी महिमा मैं दूसरे को न दूंगा और जो स्तुति मेरे योग्य है वह खुदी हुई मूरतों को न दूंगा।“ (यशायाह 42:8)

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