“तू व्यभिचार न करना।” निर्गमन 20:14
“व्यभिचार से बचे रहो; मनुष्य जो भी पाप करता है, वे देह के बाहर हैं, परन्तु व्यभिचार करने वाला अपनी ही देह के विरुद्ध पाप करता है” (1 कुरिन्थियों 6:18)
क्योंकि परमेश्वर की इच्छा यह है, कि तुम पवित्र बनो: अर्थात व्यभिचार से बचे रहो।
परमेश्वर ने आरंभ में एक पुरुष और एक स्त्री की रचना की। वे जीवन भर के लिए एक साथ जुड़ गए।

विवाह के संबंध में परमेश्वर यही योजना है – एक पुरुष और एक स्त्री जीवन भर के लिए एक साथ जुड़ जाते हैं।
तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की। (उत्पत्ति 1:27)
फिर यहोवा परमेश्वर ने कहा, “आदम* का अकेला रहना अच्छा नहीं; मैं उसके लिये एक ऐसा सहायक बनाऊँगा जो उस से मेल खाए।” और यहोवा परमेश्वर भूमि में से सब जाति के बनैले पशुओं, और आकाश के सब भाँति के पक्षियों को रचकर आदम* के पास ले आया कि देखे कि वह उनका क्या क्या नाम रखता है; और जिस जिस जीवित प्राणी का जो जो नाम आदम* ने रखा वही उसका नाम हो गया। अत: आदम* ने सब जाति के घरेलू पशुओं, और आकाश के पक्षियों, और सब जाति के बनैले पशुओं के नाम रखे; परन्तु आदम के लिये कोई ऐसा सहायक न मिला जो उस से मेल खा सके। तब यहोवा परमेश्वर ने आदम* को भारी नींद में डाल दिया, और जब वह सो गया तब उसने उसकी एक पसली निकालकर उसकी जगह मांस भर दिया। और यहोवा परमेश्वर ने उस पसली को जो उसने आदम* में से निकाली थी, स्त्री बना दिया; और उसको आदम के पास ले आया। तब आदम* ने कहा, “अब यह मेरी हड्डियों में की हड्डी और मेरे मांस में का मांस है; इसलिए इसका नाम नारी होगा, क्योंकि यह नर में से निकाली गई है।” इस कारण पुरुष अपने माता–पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे एक ही तन बने रहेंगे। (उत्पत्ति 2:18-24)

परमेश्वर ने मनुष्य को संतानोत्पत्ति और आनंद दोनों के उद्देश्य से यौन इच्छा दी है। यौन संबंध पति-पत्नी के बीच प्रेम की सबसे पूर्ण अभिव्यक्ति है। यह विवाह के विशेष आशीर्वादों और विशेषाधिकारों में से एक है। विवाह के इस आशीर्वाद की रक्षा के लिए, ईश्वर ने सातवीं आज्ञा दी – “तू व्यभिचार न करना।”
“परन्तु व्यभिचार के डर से हर एक पुरुष की अपनी पत्नी, और हर एक स्त्री का अपना पति हो। पति अपनी पत्नी का हक पूरा करे; और वैसे ही पत्नी भी अपने पति का। पत्नी को अपनी देह पर अधिकार नहीं, वरन उसके पति का है; और वैसे ही पति को अपनी देह पर अधिकार नहीं, वरन उसकी पत्नी का है। एक दूसरे को मत सताओ, परन्तु केवल कुछ समय के लिए आपसी सहमति से अलग रहो, कि प्रार्थना के लिए अवसर मिले; और फिर एक साथ हो जाओ, ताकि तुम्हारे संयमहीन होने के कारण शैतान तुम्हें परीक्षा में न डाले।“ (1 कुरिन्थियों 7:2-5)
इन वचनों में प्रेरित पौलुस विवाह की पवित्रता, पति-पत्नी के आपसी शारीरिक/भावनात्मक संबंधों और यौन शुद्धता के विषय में समझा रहे हैं।
“विवाह सब में आदर की बात समझी जाए, और बिछौना निष्कलंक (पवित्र) रहे; क्योंकि परमेश्वर व्यभिचारियों, और परस्त्रीगामियों का न्याय करेगा।“ (इब्रानियों 13:4)
यह आज्ञा यौन अनैतिकता के सभी रूपों को वर्जित करती है। व्यभिचार तब होता है जब कोई विवाहित व्यक्ति अपने जीवनसाथी के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के साथ यौन संबंध बनाता है। परस्त्रीगमन अविवाहित पुरुष और अविवाहित स्त्री के बीच यौन संबंध है। अन्य यौन पापों की तरह, परस्त्रीगमन और स्त्रीगमन दोनों ही ईश्वर की दृष्टि में घृणित हैं।
“परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं, कि जो कोई किसी स्त्री पर कुदृष्टि डाले वह अपने मन में उस से व्यभिचार कर चुका।“ मत्ती 5:28
